काँगड़ा शहर के बारे में जरूरी जानकारी

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काँगड़ा शहर के बारे में जरूरी जानकारी

Importent About Kangra City

काँगड़ा  भारत वर्ष के हिमाचल प्रदेश में स्थित एक सुन्दर और बड़ा  शहर है जो कि ऊँची घाटियों से ढका हुआ है जिसका नज़ारा देखते ही अदभुत लगता है ! काँगड़ा जिला जनसँख्या के आधार पर हिमाचल प्रदेश त्रफल के हिसाब से लाहुल एंड स्पीति है ! काँगड़ा जिला ५,७३९,KM Square में फैला हुआ है ! जिला काँगड़ा के अंदर कुल २१ तहसील है हर बर्ष बहुत से सैलानी गर्मियों के मौसम में काँगड़ा  घूमने आते है जो काँगड़ा जिले में बहुत से ऐसे tourist places है और Kangra Velly भी बहुत से सैलानियों में बहुत प्रषिद है ! काँगड़ा जिले का मुख्यालय धर्मशाला में है और धर्मशाला का नाम Smart City के नाम से भी जाना जाता है जो की जिला काँगड़ा में स्थित है ! काँगड़ा जिले की २१ तहसील के नाम इस प्रकार है :

बैजनाथ, बड़ोह, डेरागोपीपुर, धर्मशाला, धीरा, फतेहपुर, हार चक्कियां, इंदोरा, जैसिंघपुर, जसवां, ज्वालामुखी, ज्वाली, काँगड़ा, खुड्डिआं, मुल्तान, नगरोटा बगवां, नूरपुर, पालमपुर, रक्कड़, शाहपुर और थुरल !

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हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले का इतिहास 

हिमाचल प्रदेश में स्थित काँगड़ा जिले का इतिहास महाभारत युद्ध से पहले का माना जाता है प्राचीन काल में काँगड़ा का नाम त्रिगर्त था इसकी स्थापना महाभारत युद्ध से पहले की मानी जाती है!  इसकी स्थापना भूमिचंद ने की थी और इसकी राजधानी मुल्तान थी इसके २३४वे राजा सुशर्मा ने त्रिगर्त के काँगड़ा में किले की स्थापना कर उसको अपनी राजधानी बनाया त्रिगर्त की राजधानी नगरकोट (काँगड़ा शहर) था! और इसकी स्थापना सुशर्मा ने की थी तो इसको सुशर्मापुर भी कहा जाता था ! मेहमूद गजनबी के दरबारी उत्बी ने अपनी पुस्तक में  इसे भीमनगर और फरिश्ता ने इसे भीमकोट और अलबेरूनी ने नगरकोट का नाम दिया ! महाभारत के युद्ध में सुशर्मा ने कौरवो का साथ दिया था और उसने मत्स्य देश के राजा विराट पर आक्रमण भी किया था काँगड़ा का अर्थ है कण का गढ़ भगवान शिवा ने जब जलंधर राक्षस का वध किया था तो उसके कान जिस स्थान पर गिरे थे वही स्थान काँगड़ा कहलाया ! १६१५ में थॉमस कोर्यत, १६६६ में थेवेनोट, १७८३ में फास्टर और १८३२ में विल्लियम मूरक्राफ्ट ने काँगड़ा की यात्रा की थी ! १००९ में मेहमूद गजनबी ने काँगड़ा  में राजा जगदीश चंद्रा को हराकर अपने कब्जे में किया था १०४३ में तोमर राजाओ ने काँगड़ा किले को तुर्को से आज़ाद करवाया था ! १०५१-५२ फिर से तुर्को के कब्जे में चला गया ! १०६० में काँगड़ा के राजाओ ने दोबारा काँगड़ा किले को आज़ाद किया था ! मोहम्मद-बिन-तुगलक ने १३३७ में काँगड़ा में आक्रमण किया था उस समय वहाँ का राजा पृथी चंद था ! १३६५ में फिरोजशाह तुगलक ने आक्रमण किया था उस समय वहा का राजा रूपचंद था फिरोजशाह के पुत्र नसरूद्दीन ने १३८९ में भागकर नगरकोट पहाड़ियों में शरण ली थी उस समय काँगड़ा का राजा सागरचंद था ! तैमूरलंग ने १३९८ में शिवालिक की पहाड़ियों को लूटा था व समय वह का राजा मेघ चंद था ! १३९९ में वापसी में तैमूरलंग के हाथो धमेरी (नूरपुर) को लूटा गया और इसमें हिन्दुर (नालागढ़) के राजा आलम चंद ने तैमूरलंग की मदद की थी ! मेघ चंद  के बाद हरी चंद काँगड़ा के राजा बने हरी चंद के राज में एक घटना के दौरान काँगड़ा दो हिस्सों में बंट गया हरी चंद शिकार खेलने जंगल गए वहां वो अपने साथियों से बिछड़ गए उनकी तलाशी की गयी लेकिन वो नहीं मिले उन्हें मरा हुआ समझ कर उनकी जगह उनके भाई करमचंद को राजगद्दी में बैठा दिया गया २२ दिन के बाद एक व्यापारी ने हरिचंद को एक कुएं में देखा और उनको पूरी बात बताई यह सब सुनकर हरिचंद ने काँगड़ा न लौटने का निर्णय किया और बाण गंगा के किनारे एक हरिपुर नगर का निर्माण को जो आगे चलकर गुलेर राज्य से प्रसिद्द हुआ ! करमचंद के बाद बहुत से राजा नगरकोट की गद्दी पर बैठे उन्ही से एक राजा धरमचंद के कार्यकाल में शेरशाह सूरी ने १५४० ई.पु. दिल्ली पर अधिकार किया ! इसके बाद शेरशाह सूरी ने अपने सेना अध्यक्ष “ख्वास खान” नगरकोट पर हमले के लिए भेज दिया उसने किले पर अधिकार कर लिया पर कुछ ही दिनों के बाद कटोच राजाओ ने दोबारा फिर अपना अधिकार स्थापित कर लिया ! १५७० ई. पु. में जयचन्द काँगड़ा का राजा बना कहा जाता है की अकबर राजा जयचंद से नाराज़ था उसने राजा जयचंद को दिल्ली बुलाया पर जयचंद अकबर के मन की बात जान गए थे उन्होंने अपने नाबालिक पुत्र विधि चंद को जसवां के राजा गोबिंद चंद को देखभाल के लिए दे दिया और खुद अकबर से मिलने दिल्ली चला गया वहा  अकबर ने उसे बंधी बना लिया जब बहुत समय तक जयचंद नहीं लौटा विधि चंद को सिंहासन पर बैठा दिया गया उस समय उसकी आयु बहुत कम थी उसने अकबर के खिलाफ विद्रोह कर दिया विद्रोह को दबाने क लिए अकबर ने पंजाब के सूबेदार हुसैन कुली खान को नगरकोट भेज दिया उसने काँगड़ा पहुँच कर किले पर घेरा दाल दिया ३ माह तक राजा विधिचंद और कुली खान के बीच युद्ध चलता रहा जिसमे विधिचंद की तरफ से गोबिंदचंद इस युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे इसके बाद पंजाब पर इब्राहिम हुसैन मिजरा और मसूद मिजरा ने हमला कर दिया विवश होकर कुली खान को विधि चंद क साथ सुलह करनी पड़ी विधि चंद की ओर से जसवां के राजा गोबिंद चंद ने सुलह की सारी बात की सुलह के अकबर ने भी जयचंद को छोड़ दिया वापस आकर उन्होंने किले को संभाल लिया ! राजा जयचंद की मृत्यु के बाद १५८५ ई. पु. विधि चंद को गद्दी पर बैठा दिया गया विधि चंद के बाद त्रिलोक चंद १६०५ ई. पु. गद्दी पर बैठा था राजा त्रिलोक चंद ने अपने नाम के सिक्के निकालने शुरू कर दिए ! जहाँगीर त्रिलोक चंद से क्रोधित हो गया कि उसने सिक्के क्यों निकाले जहाँगीर ने त्रिलोक चंद को दंडित करने के लिए सेना भेज दी जहाँगीर त्रिलोक चंद से पहले से ही गुस्सा था त्रिलोक चंद के पास बोलने बाला तोता था जिसे जहाँगीर ने माँगा था पर त्रिलोक चंद ने उसे देने से इंकार कर दिया था और जहाँगीर इसी बात का बदला लेके का मौका दंड रहा था ओर उसे मौका मिल गया और सेना भेज दी !

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काँगड़ा की प्रिसिद्धि :

हिमाचल प्रदेश में स्थित काँगड़ा वैल्ली  तो अपने नाम के लिए ही बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है और काँगड़ा जिले में बहुत से चाय के बागान है जो की बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है जहा तक बात की जाये काँगड़ा चाय(Kangra Tea) की तो पुरे विश्व में मांग है !

 

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