Jammu & Kashmir (जम्मू और कश्मीर का परिचय)

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Jammu & Kashmir (जम्मू और कश्मीर का परिचय)

जम्मू और कश्मीर एक अनोखा राज्य jammu & kashmir

दोंस्तो आज हम जम्मू और कश्मीर के बारे में बात करेंगे जम्मू और कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जो भारत देश के सर का ताज कहलाया जाता है| और यह सभी प्रदेशों में सबसे खुबसूरत प्रदेश है| जम्मू, कश्मीर और लदाख यह तीनो अलग अलग क्षेत्र है जब भारत आज़ाद हुआ तब भारत का बहुत बड़ा भाग धर्म के नाम पर अलग हो गया जिसका नाम पाकिस्तान रखा गया| पाकिस्तान के उस वक़्त दो हिस्से थे पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान| पूर्वी पाकिस्तान सन 1971 में अलग होकर बांग्लादेश बना| विभाजन के समय पाकिस्तानी कबीलों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया| और जम्मू कश्मीर के एक भाग पर कब्ज़ा कर लिया| इस आक्रमण के दौरान भारतीय सेना कब्ज़ा मुक्ति का अभियान चला रही थी लेकिन बीच में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के द्वारा युद्ध विराम के एक तरफ़ा घोषणा के चलते एक एक रेखा का जन्म हुआ| तभी से जम्मू कश्मीर एक विवादित क्षेत्र बन गया| पहले जम्मू और कश्मीर भारत देश का एक राज्य हुआ करता था परन्तु 31 अक्टूबर 2019 में धारा 370 को हटाने के बाद इस प्रदेश को केन्द्रशासित घोषित कर दिया गया| और कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच में बहुत से युद्ध भी हुए है जिसमें 1965, 1971 और 1999 के युद्ध के बारे में तो सभी जानते है इसके अलावा भी इन दोनों देशों के मध्य कश्मीर को लेकर बहुत से द्वंध चले रहते है| यह प्रदेश जितना सुन्दर है उतना ही खतरनाक भी है| तो क्या है इस प्रदेश का इतिहास आइये जानते है इसके बारे में:

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जम्मू और कश्मीर का आज तक का इतिहास

कश्यप ऋषि के नाम से ही कश्यप सागर और कश्मीर नाम पड़ा था| कश्यप ऋषि कश्मीर के पहले राजा थे| और उन्होंने ही कश्मीर को अपने सपनों का राज्य बनाया था| राजतारंगिनी और नीलम पुराण के अनुसार कश्मीर की घाटी कभी बहुत बड़ी झील हुआ करती थी| और पहाड़ो के धसने से झील का पानी बहार निकल गया और इस तरह कश्मीर में रहने लायक स्थान बने| तीसरी शताब्दी में अशोक ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रचार कश्मीर में किया था| बाद में यहाँ कनिष्क का अधिकार रहा| छठी शताब्दी के आरम्भ में कश्मीर में मुगलों का अधिकार हो गया| और सन 530 में कश्मीर एक स्वंतंत्र राज्य रहा| इसके बाद कश्मीर पर उज्जैन सम्राट के राजाओं का अधिकार रहा| उसके बाद विक्रमादित्य के पतन के बाद कश्मीर पर स्थानीय शासकों ने राज किया वहां हिन्दू और बौद्धिक संस्कृतियों का मिश्रित रूप विकसित हुआ| कश्मीर में छठवी शताव्दी में पहले सेब राजा मिहिरकुल थे जो ह्रूण वंश से संवंधित थे| ह्रूण वंश के बाद गोनान्दा द्वितीय और कराकोता नाग वंश का शासन हुआ| जिसके राजा ललित आदित्य को कश्मीर के महान राजाओं में शामिल किया जाता है| कश्मीर के हिन्दू राजाओं में ललितादित्य ने सन 697 से 738 तक शासन किया था| उसके बाद सन 855 में कश्मीर में उत्पल वंश के सम्राट अन्निन्त्वर्मन सत्ता में आये और जिनका शासन काल कश्मीर के लिए सुख और समृधि का शासन काल था| उसी के शासनकाल के दौरान कश्मीर में बड़े पैमाने में मंदिरों का निर्माण हुआ और उस दौरान ही कश्मीर में साहित्यकारों और संस्कृत आचार्यों की लम्बी परम्परा भी शुरू हुई| जिसमे सातवीं शदी में भीम भट्ट, दामोदर गुप्ता और आठवीं सदी में क्षीर स्वामी, रत्नाकर, वल्लभ देव नौवीं सदी में माम्तात, क्षएंद्र, सोमदेव दसवीं सदी के मिल्हन, जयद्रथ ग्यारहवीं सदी के कल्हण जैसे संस्कृत के विद्वान कवियों और साहित्यकारों की लम्बी परंपरा रही| लेकिन आवन्तिवार्मन की मृत्यु के बाद हिंदु राजाओं का पतन शुरू हो गया था| क्योंकि महाराजा सहदेव के समय मंगोल आक्रमणकारी दुलचा शाह ने कश्मीर पर आक्रमण किया था| और नगर और गाँव के साथ साथ हजारों हिन्दुओं को मार दिया था बहुत से हिन्दुओं को ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया| इस अवसर का फायदा उठा कर तिब्बत से आया एक बौद्ध रिन्चन ने इस्लाम कबूल कर लिया और राजा सहदेव के सेनापति रामचंद्र के बेटी के सहयोग से कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया और इस तरह रिन्चन कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक बना| उसके बाद शाह मीर ने कश्मीर की गद्दी पर कब्ज़ा कर लिया| और इस तरह मुस्लिम शासकों ने लम्बे समय तक कश्मीर पर राज किया| सन 1420-70 तक ज़िमुल अबिदीन गद्दी पर बैठा उसके बाद 16 अक्टूबर 1586 को कासिम खान ने याकूब खान को हराकर कश्मीर में मुग़ल सल्तनत को स्थापित किया| इसके बाद 360 साल तक घाटी में मुग़ल, अफगान, सिख और डोगरे शासकों का राज रहा| मुग़ल वंश के पतन के बाद साल 1752-53 में अफगानों ने कश्मीर में कब्ज़ा कर लिया उस वक़्त अफगानों का नेतृत्व अहमद शाह अब्दाली कर रहे थे| और इन्होंने कश्मीर की जनता पर भयंकर अत्याचार किया| और अफगानों ने 65 सालों तक अफगानों ने कश्मीर पर शासन किया| और उस दौरान अफगानों के अत्याचारों से तंग आकर एक कश्मीरी पंडित वीरबलधर ने सिख राजा रंजीत सिंह से मदद मांगी| उन्होंने अपने उत्तराधिकारी खडग सिख के साथ हरी सिंह नलवा और 30,000 की सेना भेजी| और अफगानी अज़ीम खान कश्मीर को अपने भाई ज़ब्बार खान के भरोसे छोड़कर वहां से भाग गया| और इस तरह 15 जून 1819 को कश्मीर में सिख शासन की स्थापना हुई| महाराजा रंजीत सिंह से जम्मू को पंजाब में मिला लिया और बाद में उन्होंने जम्मू को गुलाब सिंह को सौंप दिया| लेकिन सन 1839 में राजा रंजीत सिंह की मृत्यु के बाद लाहौर का साम्राज्य बिखरने लगा| और अंग्रेजों के लिए यह अफगानिस्तान की खतरनाक सीमा पर यह नियंत्रण का मौका था| उसके साथ साथ जम्मू के राजा गुलाब सिंह के लिए भी खुद को स्वतंत्र राज्य घोषित करने का मौका था| उसके बाद उत्तर में कश्मीर के महाराजा की सत्ता अक्साई चिन और लदाख तक फैली हुई थी| आज़ादी के वक़्त तक जम्मू इन्हीं के अधीन रहा जम्मू के आखिरी राजा महाराजा हरी सिंह थे| आज़ादी के वक़्त तक जम्मू, कश्मीर और लदाख लेकिन राजनितिक नेताओं ने इसे एक राज्य घोषित कर दिया जिसको जम्मू और कश्मीर का नाम दिया गया| लदाख को जम्मू का हिस्सा बनाया गया| लेकिन बंटवारे के समय महाराजा हरी सिंह को जम्मू और कश्मीर को एक अलग देश बनाना था लेकिन 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने भारतीय संघ को विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए| और उस वक़्त पाकिस्तान सेना ने कबाईलो के रूप में आक्रमण कर दिया| और उसके काफी हिस्से के ऊपर कब्ज़ा कर लिया| लेकिन जब भारतीय सेना कब्ज़ा मुक्ति अभियान चला रही थी तब भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के द्वारा एक तरफ़ा युद्ध विराम की घोषणा के चलते एक रेखा (LOC) का जन्म हुआ| और तभी से लेकर आज तक जम्मू और कश्मीर एक विवादित क्षेत्र बना हुआ है| और चाइना ने भी पाकिस्तान की तरह ही सन 1962 में कुछ हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया| आज इस राज्य के तीन हिस्से भारत के पास है जो है जम्मू, कश्मीर और लदाख|

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